भारत किसी तीसरे देश के माल का रास्ता नहीं बनेगा: ट्रांसशिपमेंट पर सरकार की सख्ती का कारोबार पर असर
पीयूष गोयल ने वास्तविक value addition और origin certificate पर जोर दिया। अमेरिकी शुल्क और नए व्यापार समझौतों के बीच बयान क्यों महत्वपूर्ण है।

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि भारत को किसी दूसरे देश के सामान को केवल रास्ता देकर तीसरे बाजार तक पहुंचाने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। उनका जोर इस बात पर है कि भारत से निर्यात होने वाले उत्पाद में वास्तविक घरेलू मूल्य संवर्धन हो और उत्पत्ति प्रमाणपत्र विश्वसनीय हो।
ट्रांसशिपमेंट क्या होता है?
ट्रांसशिपमेंट सामान्य रूप से माल को एक स्थान से दूसरे स्थान भेजने की प्रक्रिया है, लेकिन व्यापार नीति में चिंता तब पैदा होती है जब किसी देश का उत्पाद मामूली बदलाव या गलत दस्तावेज के साथ किसी तीसरे देश का उत्पाद बताकर निर्यात किया जाए। इसका उद्देश्य अक्सर शुल्क या प्रतिबंध से बचना होता है।
यदि किसी उत्पाद पर भारत में पर्याप्त काम, निर्माण या रूपांतरण नहीं हुआ है, तो उसे भारतीय मूल बताना नियमों के खिलाफ हो सकता है। इसलिए सीमा शुल्क जांच और origin certificate की सत्यता महत्वपूर्ण है।
अभी यह मुद्दा क्यों उठा?
अमेरिका ने 40 से अधिक देशों के बारे में कथित छाया ट्रांसशिपमेंट की चिंता जताई है। रिपोर्ट में भारत को उच्च जोखिम वाले समूह में रखा गया और 24 जुलाई से अतिरिक्त 10 प्रतिशत शुल्क लागू करने की बात सामने आई।
ऐसे समय में भारत नए व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रहा है। नियमों के दुरुपयोग का आरोप लगने पर genuine exporters को भी ज्यादा जांच, देरी और लागत का सामना करना पड़ सकता है।
भारतीय कंपनियों पर क्या असर होगा?
जो कंपनियां घरेलू उत्पादन और स्पष्ट आपूर्ति श्रृंखला रखती हैं, उनके लिए बेहतर दस्तावेजीकरण प्रतिस्पर्धात्मक लाभ बन सकता है। लेकिन आयातित हिस्सों पर निर्भर निर्माताओं को यह साबित करना होगा कि भारत में पर्याप्त value addition हुआ है।
छोटे निर्यातकों के लिए अनुपालन की लागत बढ़ सकती है। सरकार और उद्योग संस्थाओं को डिजिटल प्रमाणपत्र, सप्लाई चेन रिकॉर्ड और उत्पाद-विशिष्ट नियमों पर स्पष्ट मार्गदर्शन देना होगा।
व्यापार समझौतों की बड़ी तस्वीर
भारत के नौ मुक्त व्यापार समझौते उन अर्थव्यवस्थाओं को कवर करते हैं जिनका संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद लगभग 60 ट्रिलियन डॉलर बताया गया है। सरकार कनाडा, मेक्सिको, चिली, मर्कोसुर, दक्षिणी अफ्रीकी सीमा शुल्क संघ, खाड़ी सहयोग परिषद और इजराइल सहित कई भागीदारों से बातचीत बढ़ाना चाहती है।
गोयल सितंबर के अंत में G20 व्यापार बैठक और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि के साथ बातचीत के लिए अमेरिका जाने वाले हैं। किसी भी द्विपक्षीय समझौते में बाजार पहुंच के साथ origin rules केंद्रीय मुद्दा रहेंगे।
आगे क्या देखना चाहिए?
नई जांच व्यवस्था, उत्पादों के लिए स्थानीय मूल्य संवर्धन की सीमा और अमेरिका के साथ बातचीत की प्रगति पर नजर रहेगी। सख्त नियम अल्प अवधि में कागजी बोझ बढ़ा सकते हैं, पर लंबे समय में Made in India दावे की विश्वसनीयता मजबूत कर सकते हैं।
इस नीति का संतुलन अहम होगा। नियम इतने मजबूत हों कि गलत रास्ते बंद हों, लेकिन वास्तविक भारतीय निर्यातक अनावश्यक देरी में न फंसें।