हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में हिमनद तेजी से अपना द्रव्यमान खो रहे हैं। रॉयटर्स के मुताबिक नई रिपोर्ट ने इस पूरे पर्वतीय क्षेत्र को गंभीर परिवर्तन के बिंदु के करीब बताया है और निगरानी की कमी तथा हिमनदीय झीलों के जोखिम पर चिंता जताई है।
इस क्षेत्र में अनुमानित 40,000 हिमनद हैं, लेकिन जमीन पर नियमित निगरानी केवल 21 हिमनदों तक सीमित बताई गई है।
भारत में करीब 200 उच्च-जोखिम झीलें
रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 200 हिमनदीय झीलें उच्च जोखिम वाली श्रेणी में हैं, जिनमें 56 को अत्यधिक जोखिम वाला माना गया है। हिमनद पीछे हटने पर बनने वाली झीलें कई बार ढीली चट्टानों और बर्फ से बने प्राकृतिक अवरोध के पीछे जमा होती हैं।
यदि ऐसा अवरोध अचानक टूट जाए तो नीचे के क्षेत्रों में तेज बाढ़ आ सकती है। अगस्त में नेपाल-तिब्बत सीमा के पास हिमनद धंसने और उसके बाद आई बाढ़ ने इस खतरे को फिर सामने रखा।
‘पीक वाटर’ का अर्थ
हिमनद तेजी से पिघलते हैं तो शुरुआती वर्षों में नदियों का प्रवाह बढ़ सकता है। लेकिन बर्फ का भंडार कम होने के बाद दीर्घकालीन जल प्रवाह घटने लगता है। इसी संक्रमण को ‘पीक वाटर’ कहा जाता है।
हिमालय भारत की नदी प्रणालियों, जलविद्युत, कृषि और करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा है। इसलिए हिमनदों का संकट केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि जल सुरक्षा, ऊर्जा और आपदा प्रबंधन का भी प्रश्न है।