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अमेरिकी ब्याज दरों में बढ़ोतरी भारत को कैसे प्रभावित करती है

तेल महंगा हो और अमेरिकी दरें भी बढ़ें, तो रुपये, पूंजी प्रवाह और भारतीय बॉन्ड बाजार पर दोहरा दबाव बन सकता है।

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अमेरिका में ऊंची मुद्रास्फीति और महंगे तेल के कारण फेडरल रिजर्व से ब्याज दर बढ़ाने की उम्मीद मजबूत हुई है। यह फैसला अमेरिकी अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहता।

दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और डॉलर की केंद्रीय भूमिका के कारण अमेरिकी दरों का प्रभाव वैश्विक पूंजी प्रवाह पर पड़ता है।

पूंजी प्रवाह कैसे बदलता है

जब अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर प्रतिफल बढ़ता है तो निवेशकों को अपेक्षाकृत सुरक्षित अमेरिकी परिसंपत्तियों में बेहतर रिटर्न मिलता है। इससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी बाहर जाने का दबाव बन सकता है।

भारत में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश घटने पर शेयर और बॉन्ड बाजार दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

रुपये पर असर

डॉलर मजबूत होने पर रुपये पर कमजोरी का दबाव बढ़ सकता है। यदि उसी समय कच्चा तेल भी महंगा हो, तो भारत को आयात के लिए अधिक डॉलर की जरूरत पड़ती है।

यह संयोजन मुद्रास्फीति और चालू खाते के लिए चुनौती बन सकता है।

रिजर्व बैंक की भूमिका

भारतीय रिजर्व बैंक विनिमय दर में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को सीमित करने, तरलता प्रबंधन और घरेलू मौद्रिक नीति के जरिए प्रतिक्रिया कर सकता है।

परीक्षा में महत्व

यह विषय मौद्रिक नीति, विनिमय दर, विदेशी पूंजी, मुद्रास्फीति और भुगतान संतुलन को एक साथ जोड़ता है। अर्थव्यवस्था के उत्तर में कारण-प्रभाव की श्रृंखला स्पष्ट दिखाना सबसे उपयोगी होगा।

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