केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2026-27 से 2030-31 के लिए प्रधानमंत्री विकसित ग्राम स्वराज योजना को मंजूरी दी है। यह देशभर में ग्रामीण स्थानीय शासन को मजबूत करने का नया पांच-वर्षीय ढांचा है। कुल परिव्यय ₹7,395.55 करोड़ है, जिसमें केंद्र का हिस्सा ₹4,869.48 करोड़ और राज्यों का हिस्सा ₹2,526.07 करोड़ है।
योजना 2.55 लाख से अधिक पंचायतों और पात्र पारंपरिक स्थानीय निकायों तक पहुंचने के लिए बनाई गई है। लगभग 32 लाख निर्वाचित प्रतिनिधि, पंचायत कर्मी और अन्य हितधारक प्रत्यक्ष लाभार्थी माने गए हैं। सरकार का जोर क्षमता निर्माण, डिजिटल एकीकरण, सहभागी स्थानीय योजना और मजबूत वित्तीय जवाबदेही प्रणालियों पर है।
एक प्रमुख विचार ग्राम पंचायतों को समेकित विकास योजनाएं बनाने में अधिक सक्षम करना है, ताकि स्थानीय योजनाएं अलग-अलग खर्च कार्यक्रम बनकर न रह जाएं। वार्षिक लक्ष्यों में 2.55 लाख से अधिक ग्राम विकास योजनाएं और लगभग इतनी ही ऑनलाइन ऑडिट योजनाएं शामिल हैं। बड़े जन-जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए प्रति अभियान कम-से-कम एक करोड़ नागरिकों तक पहुंचने की परिकल्पना भी है।
शासन की वास्तविक परीक्षा यह होगी कि प्रशिक्षण और डिजिटल प्रणालियां स्थानीय निर्णयों की गुणवत्ता सुधारती हैं या केवल रिपोर्टिंग का बोझ बढ़ाती हैं। पंचायतें वह स्तर हैं जहां अनेक कल्याण, अवसंरचना और सेवा-वितरण योजनाएं नागरिकों से मिलती हैं; इसलिए योजना की गुणवत्ता, स्थानीय डेटा, ऑडिट क्षमता और केंद्र-राज्य समन्वय सीधे क्रियान्वयन को प्रभावित करते हैं।
सिविल सेवा के लिए यह योजना पंचायती राज के संवैधानिक ढांचे, सहकारी संघवाद, विकेंद्रीकृत योजना, स्थानीय सार्वजनिक वित्त और सामाजिक जवाबदेही से जुड़ती है। नीति का महत्व केवल परिव्यय में नहीं, बल्कि इस बात में है कि तीसरे स्तर की सरकार की संस्थागत क्षमता निधियों को मापने योग्य स्थानीय परिणामों में बदल पाती है या नहीं।